मंगलवार, 16 अगस्त 2011

प्रत्याशी बेचैन

जब राजनीतिक पार्टीयाँ इस मुकाम पर पहुँच गए हों की अपने कार्यकर्ताओं पर विश्वास न हो तब क्या हश्र होगा पार्टियों का.
बसपा उलटफेर की रणनीति से प्रत्याशी बेचैन
Story Update : Monday, August 15, 2011     2:11 AM
पहले चरण की समीक्षा में फेल प्रत्याशियों का बदलना तय
प्रत्याशी अब पदाधिकारियों का विश्वास जीतने में जुट गए
नए प्रत्याशियों की घोषणा होगी हजारों की भीड़ के बीच
वाराणसी। विधानसभा चुनाव 2012 की मुहिम में जुटीं बसपा सुप्रीमो द्वारा कई प्रत्याशियों के बदले जाने के बाद प्रत्याशियों की बेचैनी बढ़ गई है। प्रत्याशी अब खुद को और सुरक्षित करने में जुट गए हैं। पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों को विश्वास में लेने और लगातार चरचाओं में बने रहने की कोशिश प्रत्याशी करने लगे हैं। पार्टी रणनीति के मुताबिक जो प्रत्याशी चुनाव खड़ा करता नजर नहीं आएगा उसके स्थान पर दूसरे को मौका मिलना तय है।
जिले में एक साथ तीन प्रत्याशियों के बदले जाने से राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है। इस बदलाव से दूसरे दलों में भी प्रत्याशियों के बदलने की प्राथमिकता बदलने के आसार हैं। पिंडरा में दूसरे दल अब पटेल प्रत्याशी पर दांव लगाने की सोच सकेंगे। दक्षिणी से बसपा ने इस बदलाव से अंसारी बिरादरी को प्रभावित करने का प्रयास किया है। सेवापुरी में पार्टी ने इस बदलाव में फिर से भूमिहार बिरादरी पर ही दांव लगाया है। बदलाव के बाद नये प्रत्याशियों की घोषणा भी धमाकेदार अंदाज में करने की रणनीति बनी है। तीनों विधानसभा क्षेत्रों में 16 अगस्त को अलग अलग सभाएं कर नये नामों की घोषणा होगी। नये प्रत्याशियों पर भारी भीड़ जुटाने का दबाव है। इस कार्यक्रम में पदाधिकारी अभी से लगा दिए गए हैं।
जिस तरीके से पार्टी प्रत्याशियों के प्रयास और क्षेत्र में उनकी छवि की समीक्षा कर रही है आने वाले दिनों में पूर्वांचल से कुछ और प्रत्याशी भी बदले जा सकते हैं। कुछ प्रत्याशियों के नामों पर चरचा चलने लगी है। दूसरी तरफ विधायक सुशील सिंह को फिर से टिकट दिए जाने के पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि उनके अंदर फिर से सीट निकालने का माद्दा है। उनके चुनाव लड़ने से पूर्वांचल में क्षत्रिय समाज के लोग पार्टी से जुड़े रहेंगे। सुशील को पूर्वांचल में क्षत्रियों को जोड़ने की जिम्मेदारी भी दी जा सकती है।

बुधवार, 10 अगस्त 2011

बंगले को करोड़ों की दरकार


मायावती
उत्तर प्रदेश सरकार ने मुख्यमंत्री मायावती को भूतपूर्व मुख्यमंत्री के तौर पर मिले सरकारी बंगले में निर्माण के लिए विधानसभा से 22 करोड़ से भी अधिक की अतिरिक्त धनराशि की मांग की है.
यह मांग मंगलवार को विधान सभा में वर्तमान वित्तीय वर्ष के लिए पेश अनुपूरक बजट में की गई है. सरकार ने 108 अरब से अधिक रुपयों के लिए अनुपूरक बजट पेश किया है.
मायावती को मॉल एवेन्यू इलाक़े का यह बंगला वर्ष 1995 से आबंटित है, जब वे पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थी.
मायावती जितनी बार मुख्यमंत्री बनीं, उतनी बार 13, मॉल एवेन्यू बंगले में नया निर्माण और विस्तार होता गया और बंगले की चारदीवारी ऊँची होती गई.
इस समय बंगले की चारदीवारी लाल क़िले से भी ऊँची है. इसी बंगले के सामने दो-तीन पुराने बंगलों को तोड़कर बहुजन समाज पार्टी का कार्यालय भी बनाया गया है.

साज-सज्जा

इस बार वर्ष 2007 में सरकार बनते ही बगल का गन्ना आयुक्त कार्यालय और पीछे का एक बंगला भी ख़ाली कराकर 13, मॉल एवेन्यू में मिला लिया गया.
निर्माण में लगे कर्मचारी बताते रहते हैं कि किस तरह मायावती नए कमरे, किचेन, बाथरूम और तहखाना वगैरह बनवाती हैं और फिर उन्हें तोडकर नए सिरे से बनवाती हैं.
बंगले की साज-सज्जा में भी महंगे सामान और उपकरण लगते हैं और फिर बदले जाते हैं.
अनुपूरक अनुदान के पेज नंबर 122 में लिखा गया है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने मायावती के बंगले के लिए इस वर्ष आकस्मि निधि से उधार लेकर 20 करोड़ रूपए से अधिक ख़र्च कर दिए हैं.

अब आकस्मि निधि में यह धन वापस करने के लिए सरकार विधान सभा से मोहर लगवाना चाहती है. यह भी कहा गया कि इस बंगले में विभिन्न कार्यों के लिए दो करोड़ 37 लाख रुपयों की और आवश्यकता है.

विपक्ष के नेता शिवपाल सिंह यादव का कहना है कि अब तक इस बंगले पर 150 करोड़ रूपए ख़र्च हो चुके हैं.
इसके अलावा अनुपूरक बजट में मुख्यमंत्री की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त कारें और सिग्नल जैमर ख़रीदने के लिए भी 26 करोड़ रुपयों की मांग की गई है.

सुरक्षा

मायावती अपनी सुरक्षा को लेकर बहुत चिंतित रहती हैं. उन्होंने सचिवालय एनेक्सी मुख्यमंत्री कार्यालय में जाने के लिए पीछे से एक अलग रास्ता बनवाया है. जब वह शहर में निकलती हैं बड़ी तादाद में पुलिस तैनात होती है.
उनके साथ क़रीब दो दर्जन गाड़ियां और एम्बुलेंस वगैरह चलती है. मायावती के प्रिय स्मारकों के निर्माण और रख-रखाव के लिए भी और धनराशि की मांग अनुपूरक बजट में की गई है.
इनमें गोमती तट पर निर्माणाधीन 32 करोड रूपए और कांशीराम इको गार्डन के लिए अतिरिक्त 41 करोड़ रूपए की मांग की गई है. याद दिला दें कि मायावती के प्रिय स्मारकों और मूर्तियों आदि पर कई हज़ार करोड़ रूपए ख़र्च हो चुके हैं. इन स्मारकों के 161 करोड़ रुपयों के कार्पस की व्यवस्था पहले से है.
विधान सभा में नेता विरोधी दल शिवपाल सिंह यादव और कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने इन सब कार्यों को फ़िजूलख़र्ची और जनता के पैसे का दुरूपयोग बताया है.
लेकिन सबको मालूम है कि मायावती विपक्ष की आलोचनाओं की परवाह नही करती.
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बहन मायावती ज़ी उत्तर प्रदेश की शासिका हैं उनके आवास पर क्या खर्च हो रहा है यह खबर तो होनी ही नहीं चाहिए, सोनिया के इलाज पर कितना खर्च हो रहा है इसपर रामदत्त ज़ी को याद नहीं आता है. लेकिन उन्हें बहन ज़ी का दो चार हज़ार करोड़ क्या होता है पर नज़र नहीं डालनी चाहिए, करोड़ों अरबों की संपत्ति से जब सवर्ण अपने महल बना रहा था या होता है तो किसी का ध्यान नहीं जाता है. लोक तंत्र में दलितों की ही संपत्ति दिखाई देती है. 
जब भाई जी कहीं से भी ईमानदार नहीं हैं, बहन मायावती से उनका स्नेह है या पूर्वजन्म का कोई ताल्लुक क्योंकि जैसे ही भाई शिवपाल मुहं खोलते हैं वैसे ही यह मान लिया जाता है की यह जरूर ईर्ष्यावश कह रहे हैं या कह रहे होंगें. यदि यही बात कोई अन्य व्यक्ति कहता जो भाई शिवपाल ज़ी की छवि से मेल नहीं खाता तो एक बड़ी खबर होती.  
    (यद्यपि श्री शिवपाल यादव यह कहने का हक नहीं रखते की मायावती जी या मायावती के आवास पर कितना खर्च हो रहा है.यह बात यहीं पर ख़तम नहीं होती बल्कि कई सवाल अनुतारित्त रह जाते हैं क्योंकि भाई शिवपाल नैतिक रूप से इमानदार नहीं हैं)
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    साभार बी बी सी से

रविवार, 7 अगस्त 2011

रेल टिकट आरक्षण में 'घोटाला'



भारतीय रेलवे
महालेखाकार ने आम रेलवे यात्रियों के अंदेशों की पुष्टि कर दी है
भारत के नियंत्रक और महालेखाकार ने शुक्रवार को संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा है कि रेलवे कर्मचारियों और दलालों का गठजोड़ तत्काल कोटे में मिलने वाली टिकटों में भारी धांधली करता है.
महालेखाकार ने भारतीय रेलवे की कंप्यूटराइज्ड तत्काल और अग्रिम आरक्षण सुविधा की जाँच करने पर पाया कि जिन आम ज़रूरतमंद यात्रियों की सुविधा के लिए यह सेवा बनी है वो इस घोटालेबाज़ी के कारण इसका पूरा लाभ नहीं ले पाते.
उल्लेखनीय है कि रेलवे की इंटरनेट आरक्षण सुविधा के ज़रिए हर दिन लाखों टिकटें बुक होती हैं.
यात्री हमेशा टिकटें न मिलने की शिकायत करते हैं जबकि रेलवे के अधिकारी कहते रहे हैं कि इंटरनेट पर आरक्षण सुविधा पारदर्शी है.

शिकायत पर मुहर

जांच में पाया गया कि टिकट खिड़की खुलने के चंद ही मिनटों में तत्काल कोटे की सभी टिकटें खत्म हो जाती हैं
महालेखाकार की रिपोर्ट
महालेखाकार ने संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा है," जांच में पाया गया कि टिकट खिड़की खुलने के चंद ही मिनटों में तत्काल कोटे की सभी टिकटें खत्म हो जाती हैं."
भारतीय ट्रेनों में यात्रा करने वाले आम यात्री लम्बे समय से रेलवे कर्मचारियों और दलालों की मिलीभगत की शिकायत कर रहे हैं लेकिन यह पहली बार हुआ है कि किसी गंभीर राष्ट्रीय एजेंसी ने इस शिकायत पर मुहर लगाई है.
अपनी जांच में महालेखाकार ने पाया कि ठीक सुबह आठ बजे जब तत्काल टिकट की बुकिंग कंप्यूटर पर खुलती है तभी बुकिंग कंप्यूटर हैंग हो जाते हैं. जब तक यात्री लॉगइन करता है तब तक सभी टिकटें ख़त्म हो जाती हैं.
रिपोर्ट में साफ़ कहा गया है,"चार पांच मिनट में ही तत्काल कोटे की सभी टिकटें ख़त्म हो जाती हैं."
पहले भारतीय रेल में तत्काल कोटे की टिकट का आरक्षण यात्रा का दिन छोड़ कर पांच दिन पहले शुरू होता था जो बाद में घटा कर दो दिन कर दिया गया.
तत्काल कोटे की टिकटें इंटरनेट पर सुबह आठ बजे से शाम आठ बजे तक बुक की जा सकती हैं.
अवकाश वाले दिनों में यह सुविधा केवल सुबह आठ से दोपहर दो बजे तक ही उपलब्ध होती है.
(साभार बीबीसी हिंदी)

'यूपी में स्मारकों पर अतिरिक्त ख़र्च हुआ'


स्मारक
सीएजी के अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार ने दो स्मारकों पर ज़रुरत से अधिक ख़र्च किया.
भारत के नियंत्रक और महालेखाकार ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने दो प्रोजेक्टों में 66 करोड़ रुपए ज़रुरत से अधिक ख़र्च किए हैं.
ये दो परियोजनाएं हैं लखनऊ स्थित भीमराव अंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल और मान्यवर कांशी राम स्मारक स्थल.
इन्हें बनवाने का जिम्मा राजकीय निर्माण निगम के पास था. महालेखाकार ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इन परियोजनाओं के लिए 15 करोड़ रुपए में राजस्थान से पत्थर मंगवाए और फिर उन्हें वापस राजस्थान भेजा गया.
इसके अलावा परियोजनाओं के ठेकों में संशोधन कर भी सरकार ने 22 करोड़ रुपए का टाला जा सकने वाला ख़र्च किया.
इस रिपोर्ट के शुक्रवार को उत्तर प्रदेश विधान सभा में रखा गया है.

टाला जा सकने वाला ख़र्च

स्मारक
सीएजी के अनुसार चुनार के पत्थरों को राजस्थान भेजना और वहां से वापस लखनऊ लाना ग़ैर-ज़रुरी था.
रिपोर्ट में कहा गया है कि इन दोनों परियोजनाओं के लिए शुरू में 881.22 करोड़ रुपए का बजट था. इसमें से भीमराव अंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल के 366.82 करोड़ रुपए और मान्यवक कांशीराम स्मारक स्थल के लिए 514.4 करोड़ का बजट था.
लेकिन 31 दिसंबर 2009 को ये ख़र्च 2451.93 करोड़ तक पहुंच गया.
रिपोर्ट में कहा गया है कि इसमें 2261.19 करोड़ रुपए नवंबर 2007 से दिसंबर 2009 के बीच जारी किए गए.
नियंत्रक और महालेखाकार की रिपोर्ट में कहा गया है कि इन दोनों परियोजनाओं के लिए मिर्ज़ापुर के चुनार से पत्थर राजस्थान के बयाना में ले जाए गए जहां उनपर कारीगरी करने के बाद उन्हें वापस लखनऊ लाया गया.
रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर मिर्ज़ापुर के चुनार में ही पत्थरों को तराशा जाता तो 15.6 करोड़ रुपए बच जाते.

रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि राजकीय निर्माण निगम ने कुछ काम ऊंची कीमतों पर करवाए जिसके चलते कई करोड़ रुपए अधिक ख़र्चा हुए.
(साभार बीबीसी हिंदी)

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

सोनिया का इलाज और कांग्रेसी ला इलाज


अमेरिका में होगी सोनिया की शल्यक्रिया, राहुल देखेंगे कामकाज
नई दिल्ली, एजेंसी
First Published:04-08-11 10:20 PM

Last Updated:05-08-11 01:39 AM
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की अमेरिका में शल्यक्रिया होगी। इसका खुलासा नहीं किया गया है कि उनकी यह शल्यक्रिया किस परेशानी के चलते होगी। सोनिया ने कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी सहित चार लोगों के एक समूह का गठन किया है, जो उनकी गैरमौजूदगी में पार्टी के रोजाना के कामकाज का जिम्मा संभालेगा। वह संभवत: करीब एक महीने तक देश से बाहर रहेंगी। यह नहीं बताया गया है कि किस तकलीफ के चलते उनकी सर्जरी होनी है।
कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने संसद भवन परिसर में इस बारे में संक्षिप्त जानकारी देते हुए संवाददाताओं को बताया था कि 64 वर्षीय सोनिया गांधी को हाल ही में किसी तकलीफ के चलते चिकित्सकों द्वारा शल्यक्रिया की सलाह दी गई थी।

उन्होंने कहा कि हाल में सोनिया गांधी की ऐसी तकलीफ का पता चला जिसमें शल्यक्रिया कराना जरूरी है। चिकित्सकों की सलाह पर वह विदेश गईं हैं। संभावना है कि वह वहां पर दो-तीन सप्ताह रहेंगी।
सोनिया गांधी इस सप्ताह की शुरुआत में अमेरिका के किसी स्थान के लिए रवाना हुई थी। उनके साथ उनके पुत्र राहुल गांधी भी हैं। कांग्रेस इस बारे में चुप है कि सोनिया का इलाज कहां चल रहा है। 
*जनार्दन द्विवेदी ने पहले बताया कि सोनिया का आपरेशन सफल रहा, 
*लेकिन बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि ऑपरेशन अभी हुआ नहीं है और अगले एक-दो दिन में हो सकता है।
उन्होंने बताया कि सोनिया ने निर्णय किया है कि उनकी गैरमौजूदगी में राहुल गांधी और वरिष्ठ नेता ए के एंटनी, अहमद पटेल और जनार्दन द्विवेदी का समूह पार्टी मामलों की देख-रेख करेगा।
महत्वपूर्ण बात यह है कि इस समिति में सरकार के सिर्फ एक ही मंत्री को शामिल किया गया है। समिति में प्रधानमंत्री मलनमोहन सिंह और वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी को शामिल नहीं किये जाने के बारे में पूछने पर कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्षा ने पार्टी के काम काज को देखने के लिए चार सदस्यों को जिम्मेदारी दी है। ये सभी पार्टी के वरिष्ठ सदस्य हैं। मैं नहीं समझता कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा बनायी इस समिति के ऊपर कोई टिप्प्णी करने की जरूरत है।
*यह पूछे जाने पर सोनिया गांधी का स्वास्थ्य कैसा है और और उनकी किस तरह की सर्जरी होने वाली है, के जवाब में तिवारी ने इस बारे में विस्तृत जानकारी देने से इंकार किया और कहा कि सार्वजनिक जीवन में जो व्यक्ति हैं, जहां तक उनके सेहत और चिकित्सा का संबंध है, उनको भी थोड़ी बहुत प्राइवेसी का हक है। कृपया आप इस संवेदनशीलता का ख्याल रखें
........................
(हिंदुस्तान से साभार)
तारांकित वाक्यों को देखें और उनमें कांग्रेसियों की स्वामिभक्ति और बेचारगी पर गौर करें |

शनिवार, 30 जुलाई 2011

किसका लोकपाल


सुरेंद्र कुमार
Story Update : Friday, July 29, 2011    9:35 PM
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सरकार, विपक्षी दल, उद्योग जगत, मीडिया, नागरिक समाज और अनगिनत स्वयंसेवी समूह आम आदमी का भाग्य बदलने के लिए अथक परिश्रम का दावा करते हैं। लेकिन पिछले एक दशक से आठ प्रतिशत आर्थिक विकास दर के बावजूद देश की 70 करोड़ जनता महसूस करती है कि उनका जीवन बेहतर नहीं हुआ है। पेशेवर अर्थशास्त्रियों को इस पर बहस करने दीजिए कि गरीब कौन है ः वह जो रोज 12 रुपये कमाता है या वह, जो 14 रुपये कमाता है। अगर 25 रुपये दैनिक कमाने वाले को गरीब माना जाए, तब भी यह आश्चर्य ही है कि पिछले एक वर्ष से बुनियादी जरूरत की चीजों की आसमान छूती कीमत के दौर में वह जिंदा कैसे है।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी मनरेगा व खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम का श्रेय लेते हैं, जो उचित ही है। विदर्भ में भारी संख्या में लोग इन्हीं दो उपायों के कारण भूख और आत्महत्या से बच पाए। लेकिन विद्रूप यह है कि इन योजनाओं को लागू करने वाले लोग ही करोड़ों रुपये डकार गए हैं। मौज-मस्ती करने वालों को जनता के हित-अहित का ज्ञान नहीं होता।

अस्सी के दशक में राजीव गांधी ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि सरकार द्वारा भेजे गए एक रुपया में से मात्र 15 पैसे ही लक्षित समूह तक पहुंच पाता है। उसके लगभग ढाई दशक बाद उनके पुत्र राहुल गांधी कहते हैं कि एक रुपया में मात्र दस पैसे ही जरूरतमंदों तक पहुंच पाता है। आर्थिक उदारीकरण के दो दशकों में जीडीपी कई गुना बढ़ा है, लेकिन भ्रष्टाचार भी इतना ही बढ़ गया है। इसके लिए कौन दोषी है, राजनेता या आम आदमी?

सरकार भ्रष्टाचार को पूरी तरह से खत्म करने का दावा करती है और अपनी ईमानदारी के सुबूत के रूप में राजा, कलमाडी एवं कनिमोझी को जेल भेजने का हवाला देती है। उसके विरोधियों का कहना है कि ये गिरफ्तारियां सुप्रीम कोर्ट के सीधे हस्तक्षेप और मीडिया, आम आदमी, सिविल सोसाइटी खासकर अन्ना हजारे टीम के भारी दबाव का नतीजा हैं। जिस तरह से भ्रष्टाचार के नए मामले रोजाना सामने आ रहे हैं, उससे लगता है कि पूरा देश ही भ्रष्टाचार के दलदल में धंस गया है।

मनमोहन सरकार और 125 वर्ष पुरानी कांग्रेस हताश, असुरक्षित और असहाय नजर आ रही है। दोनों ही आतंकवाद, महंगाई, नक्सलवाद, भूमि अधिग्रहण, तेलंगाना जैसे मुद्दों पर खुद को मुश्किल में पा रहे हैं। लेकिन जो मुद्दा उन्हें सबसे ज्यादा परेशान कर रहा है, वह भ्रष्टाचार है। अगर भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान जारी रहा और नए मामले इसी तरह निकलते रहे, तो चाहे उनके खिलाफ कानूनी रूप से कुछ साबित हो या नहीं, कांग्रेस अगले संसदीय चुनाव में हारकर केंद्र की सत्ता खो सकती है।

अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों को गंभीर, ईमानदार और संवेदनशील माना जाता है। वे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के लिए प्रतिबद्ध और गंभीर हैं। लेकिन यह भी स्वीकार करना चाहिए कि न तो अन्ना हजारे महात्मा गांधी हैं और न उनके समर्थक देवदूत। जो रणनीति उन्होंने अपनाई है, वह भी गांधीवादी नहीं है। हजारे लोकतांत्रिक नहीं हैं: उन्होंने भूषण द्वय (शांति और प्रशांत) को संयुक्त मसौदा समिति में शामिल करने के लिए तमाम सार्वजनिक विरोधों को दरकिनार कर दिया। गांधी कहते थे, पाप से घृणा करो, पापी से नहीं। लेकिन हजारे राजनेताओं का मजाक उड़ाने का मौका शायद ही कभी चूकते हैं और उन सभी को भ्रष्ट बताते हैं। क्या यह उचित है? दिग्विजय सिंह के उकसावे पर हजारे की टिप्पणी, कि उन्हें इलाज के लिए पुणे के पागलखाने में ले जाना चाहिए, कहीं से भी गांधीवादी नहीं थी। सबसे बड़ी बात कि गांधी जी ने टोपी उछालने के लिए कभी अनशन पर जाने की धमकी नहीं दी, जबकि अन्ना ने ऐसा किया।

अन्ना हजारे की टीम के अलावा भी लाखों भारतीय ईमानदार और भ्रष्टाचार विरोधी हैं, लेकिन वे सड़क पर लड़ाई के लिए नहीं उतरते। हां, सर्वव्यापी भ्रष्टाचार से हताश ये लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ हो लेते हैं। टीम अन्ना का कहना है कि उसने यह अभियान देश के नागरिकों के हित में छेड़ा है, जो उसके मुताबिक संसद से बड़ा है। सरकार भी यही दावा करती है। लेकिन वह संविधान और संसद को नजर अंदाज नहीं कर सकती।

जंतर-मंतर पर मिले समर्थन और सरकार की घबराहट से वाकिफ अन्ना ने 16 अगस्त से अनशन पर जाने और आजादी की दूसरी लड़ाई शुरू करने की घोषणा कर दी है। लेकिन कइयों को लगता है कि उनकी रणनीति अलोकतांत्रिक है। उन्होंने प्रधानमंत्री, मंत्रियों, उच्च न्यायपालिका और वरिष्ठ लोक सेवकों के खिलाफ मुकदमा चलाने की वकालत की, लेकिन आम आदमी को कांस्टेबल, दारोगा, पटवारी, बीडीओ, तहसीलदार, मुंसिफ, कलक्टर और अन्य सरकारी कर्मचारियों से बचाने के लिए कुछ भी नहीं सुझाया, जिससे उसे रोजाना निपटना पड़ता है।

अगर सरकार और राजनेताओं की साख अच्छी होती, तो कैबिनेट द्वारा पारित लोकपाल विधेयक की इतनी आलोचना नहीं होती। लेकिन मामला यह नहीं है। कॉरपोरेट भ्रष्टाचार और चुनावी फंडिंग में इसकी भूमिका के बारे में इस विधेयक में कुछ नहीं है। जाहिर है, चुप्पी जवाब नहीं हो सकती। बेशक एक मजबूत लोकपाल विधेयक भ्रष्टाचार पर कमोबेश अंकुश लगाने की उम्मीद जगा सकता था, लेकिन आम आदमी का जिस भ्रष्टाचार से रोज सामना होता है, वह तब तक खत्म नहीं हो सकता, जब तक सरकार की ओर से वास्तविक प्रतिबद्धता नहीं जताई जाती।
- लेखक पूर्व राजनयिक हैं।
(अमर उजाला से साभार)

शनिवार, 16 जुलाई 2011

शशांक की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट ने पूछा सवाल


नई दिल्ली।
Story Update : Saturday, July 16, 2011    1:58 AM
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उत्तर प्रदेश में कैबिनेट सचिव का पद सृजित कर शशांक शेखर को नियुक्ति किए जाने पर सवाल उठाया है। अदालत ने शुक्रवार को कहा कि किस नियम के तहत इस पद पर एक गैर आईएएस-पीसीएस व्यक्ति की नियुक्ति की गई। प्रदेश सरकार यह कैसे कर रही है। क्या राज्य में जंगलराज है जो किसी को भी बिना सोचे-समझे मनमाने तरीके से किसी भी पद पर बैठाया जा रहा है।

नियुक्ति के लिए किस नियम का प्रयोग किया
सर्वोच्च अदालत ने यह टिप्पणी मैगसायसाय पुरस्कार विजेता संदीप पांडेय की ओर से दायर याचिका पर की। याचिका में राज्य सरकार की ओर से कैबिनेट सचिव का पद सृजित कर उस पद पर शशांक शेखर की नियुक्ति करने और उनका कार्यकाल बढ़ाने को निरस्त करने की मांग की गई है। जस्टिस वीएस सिरपुरकर व जस्टिस टीएस ठाकुर की पीठ ने शशांक शेखर की नियुक्ति पर तब उक्त टिप्पणी की, जब कैबिनेट सचिव की ओर से पेश अधिवक्ता ने हाईकोर्ट में ऐसी ही एक याचिका लंबित होने का हवाला देते हुए याचिका को खारिज करने की मांग की। पीठ ने अधिवक्ता से पूछा कि राज्य सरकार ने कैबिनेट सचिव का पद सृजित करने और नियुक्ति के लिए किस नियम का प्रयोग किया।

सुनवाई में राज्य की ओर से कोई अधिवक्ता नहीं
इस सवाल पर अधिवक्ता की ओर से कोई जवाब न मिलने पर पीठ ने कहा कि याचिका में कहा गया है कि नियुक्ति में इसका ख्याल भी नहीं रखा गया कि व्यक्ति उसके योग्य है भी या नहीं। हालांकि सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से कोई अधिवक्ता मौजूद नहीं था। अदालत ने मामले की सुनवाई अगले शुक्रवार तक के लिए टाल दी। याद रहे कि 4 जुलाई को जस्टिस आफताब आलम की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था। गौरतलब है कि याचिका में कहा गया है कि कैबिनेट सचिव के पद पर नियुक्त शशांक शेखर ने आईएएस या पीसीएस नहीं हैं।

सन् 1979 में शशांक की नियुक्ति पायलट के तौर पर हुई थी। इसके बाद 1982 में उन्हें प्रमोशन देकर नागरिक उड्डयन निदेशक बना दिया गया। इसके बाद उन्हें प्रमुख सचिव के पद का कार्य भी दिया गया, जो कि राज्य सरकार का गैरकानूनी और मनमाना रवैया था। याचिका में आरोप लगाया है कि लखनऊ में एक बड़े भू-भाग को शेखर ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर अपने भाई के नाम पर कराई है। याचिकाकर्ता ने इस मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की है। याचिका में केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार, कैबिनेट सचिव शशांक शेखर, सीबीआई और नागरिक उड्डयन मंत्रालय को पक्षकार बनाया गया है।

दिग्गी ने मांगा शशांक शेखर का इस्तीफा
उत्तर प्रदेश के कैबिनेट सचिव शशांक शेखर की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट की ओर से सवाल उठाने के मुद्दे को कांग्रेस ने पकड़ लिया है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने शशांक शेखर के इस्तीफे की मांग कर मायावती सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश शुरू कर दी है। कांग्रेस ने इस मसले पर मायावती सरकार पर अपने फायदे के लिए असंवैधानिक फैसले करने का आरोप लगाया है। दिग्विजय सिंह ने सवाल किया कि जो व्यक्ति कभी आईएएस अफसर नहीं रहा हो, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह किसी जमाने में पायलट था, उसे कैसे नियमों को ताक पर रख कर राज्य का कैबिनेट सचिव बना दिया गया।

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से सवाल उठाने के बाद शशांक शेखर को खुद इस्तीफा दे देना चाहिए और अगर वह ऐसा नहीं करते तो मुख्यमंत्री को उन्हें तुरंत इस पद से हटा देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की ओर से माया सरकार को झटके से पार्टी गदगद है। पार्टी का मानना है कि भ्रष्टाचार, किसान आंदोलन, खराब कानून व्यवस्था के मुद्दे पर जूझ रही माया सरकार के लिए सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी एक और प्रहार है, जिससे निपटना राज्य सरकार के लिए आसान नहीं होगा। कांग्रेस महासचिव ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी से इस सिलसिले में बातचीत कर सूबे में पार्टी द्वारा इस मुद्दे को जोर शोर से उठाने के निर्देश दिए हैं।

अमर उजाला