शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

'इज्जत बचाऊं या नौकरी,


'इज्जत बचाऊं या नौकरी, जहां जाती हूं वहां रखी जाती है शर्त...?'

 
Source: भीमसिंह मीणा   |   Last Updated 05:00(20/04/12)
 
 
 
 
भोपाल। केंद्र सरकार ने महिलाओं को यौन उत्पीड़न जैसे मामलों से छुटकारा दिलाने के लिए जो कानून बनाया है, उसकी केंद्रीय श्रमिक शिक्षा बोर्ड के भोपाल ऑफिस में ही धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। यहां काम करने वाली कनिष्ठ श्रेणी लिपिक भारती (पीड़िता के अनुरोध पर नाम परिवर्तित) ने आरोप लगाया है कि उनके रीजनल डायरेक्टर आरएस माथुर और तत्कालीन यूडीसी चंद्रशेखर कदम ने पहले उनके ऊपर यौनाचार के लिए दवाब डाला और जब विरोध किया तो मानसिक प्रताड़ना देने लगे।

भारती ने इस पूरे मामले की शिकायत केंद्रीय श्रमिक शिक्षा बोर्ड के निदेशक अरविंद कुमार दर्वे को की, तो उन्होंने लिखित में शिकायत न करने की सलाह देते हुए जांच और कार्रवाई करने का आश्वासन दिया। इसके बाद जांच भी की गई, लेकिन भारती को इंसाफ के बजाय नौकरी से निकाले जाने की धमकियां मिलने लगीं। इसके बाद जब भारती ने बोर्ड के अध्यक्ष अशोक सिंह को लिखित शिकायत की तो उचित कार्रवाई करने के बजाय मेमोरेंडम थमा दिया गया। इसमें तीन दिन के भीतर भारती से जवाब मांगा गया कि उन्होंने उच्च अधिकारी से सीधे पत्राचार कैसे कर लिया? सरकारी प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं किया?

आखिर कौन करेगा भारती का इंसाफ

भारती के अनुसार वे बोर्ड के भोपाल जोनल ऑफिस में लिपिक के पद पर कार्य करती हैं। भारती को 28 अक्टूबर 2011 को दोपहर में रीजनल डायरेक्टर आरएस माथुर ने कॉल करके तत्काल ऑफिस आने को कहा। जब भारती ने कहा कि वो ऐच्छिक अवकाश पर है तो माथुर ने कहा कि अगर आज ऑफिस नहीं आईं तो नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा। आखिर भारती ऑफिस पहुंची तो वहां आरएस माथुर के साथ तत्कालीन यूडीसी चंद्रशेखर भी मौजूद थे।

दोनों ने भारती से कहा कि उसके खिलाफ मिनिस्ट्री से कोई गोपनीय पत्र आया है और तुम्हें तत्काल नौकरी से निकाले जाने के आदेश हैं। जब भारती ने वह गोपनीय पत्र मांगा तो दोनों ने ही दिखाने से मना कर दिया। सवाल यह है कि आरएस माथुर रीजनल के हेड हैं, जबकि भारती जोनल ऑफिस में पदस्थ हैं। भारती के अधिकारी नागपुर में बैठते थे। इसलिए माथुर को भारती से सवाल करने का कोई अधिकार नहीं था। यदि पूछताछ करना भी थी तो फिर भारती को उनके खिलाफ आया गोपनीय पत्र क्यों नहीं दिखाया गया। डीबी स्टार ने भी वह पत्र मांगा, लेकिन नहीं दिखाया गया।

जांच की तो प्रतिवेदन क्यों नहीं बनाया

घटना के तत्काल बाद भारती ने नागपुर मुख्यालय के डायरेक्टर अरविंद कुमार दर्वे को मोबाइल पर पूरी जानकारी दी तो उन्होंने जांच का आश्वासन देकर लिखित शिकायत करने से मना कर दिया। इसके बाद जांच करने दर्वे 20 नवंबर 2011 को भोपाल आए। यहां उन्होंने ऑफिस में काम करने वाले चारों शिक्षा अधिकारी और क्षेत्रीय निदेशक समेत अलग-अलग लोगों से बात की।

जांच पड़ताल के बाद आरएस माथुर ने अपनी गलती मानी और माफी मांगी। (डीबी स्टार के पास मोबाइल की रिकॉर्डिग मौजूद)। ऐसे में यह तो साफ हो ही जाता है कि आरएस माथुर और चंद्रशेखर कदम ने मिलकर भारती को मानसिक प्रताड़ना दी। लेकिन अरविंद कुमार दर्वे ने भी भारती से मामला खत्म करने को कहा।

सवाल यह है जब यह बात साबित हो गई थी तो फिर आरएस माथुर और चंद्रशेखर को कारण बताओ नोटिस क्यों जारी नहीं किया? अरविंद कुमार दर्वे ने क्यों लिखित शिकायत करने से इंकार किया?

बिना जांच मेमोरेंडम क्यों भेजा गया?

भारती ने 4 अप्रैल 2012 को केंद्रीय श्रमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष अशोक सिंह को लिखित शिकायत की। लेकिन इसका उल्टा असर हुआ। भारती को मेमोरेंडम भेजा गया। इसमें मुख्य रूप से अन्य अधिकारियों को छोड़ सीधे-सीधे वरिष्ठ अधिकारी को शिकायत करने पर एतराज जताया गया। ऐसे आठ बिंदुओं का जवाब मांगा गया। भारती ने भी बिना देरी किए सभी बिंदुओं के जवाब लिखकर 12 अप्रैल 2012 को एक पत्र बी.वी. रमेश बाबू सहायक निदेशक केंद्रीय श्रमिक शिक्षा बोर्ड नागपुर के नाम भेज दिए हैं। इसमें उन्होंने स्पष्ट किया है कि उन्होंने सीधे शिकायत क्यों की?

सवाल यह है कि शिकायत के बावजूद जब डायरेक्टर स्तर पर भारती पक्षपात की शिकार हो रही थी तो वह अध्यक्ष के अलावा किसको शिकायत करती? अधिकारियों ने बिना उसका पक्ष जाने आखिर किस आधार पर नोटिस जारी किया। जबकि किसी भी शिकायत के बाद पहले उसकी जांच कराई जाती है और फिर कार्रवाई की जाती है।

आरोपी को जांच के अधिकार कैसे मिले?

नागपुर कोतवाली में 11 अप्रैल 2012 को नागपुर श्रमिक शिक्षा बोर्ड कार्यालय की एक वरिष्ठ लिपिक महिला ने शिकायत दर्ज कराई। उक्त महिला ने जिन लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई, उनमें बोर्ड के निदेशक अरविंद कुमार दर्वे भी शामिल हैं। इन सभी पर महिला ने मानसिक प्रताड़ना और यौनाचार के लिए दबाव डालने के आरोप लगाए हैं।

सवाल यह है कि जब अरविंद कुमार दर्वे खुद आरोपों के घेरे में हैं तो भारती की जांच उन्हें किस आधार पर सौंपी गई? आखिर दिल्ली स्थित केंद्रीय श्रमिक बोर्ड से क्यों जांच नहीं कराई जाती?

मोबाइल पर किए भारती को मैसेज

भारती के मोबाइल पर चंद्रशेखर कदम ने इस तरह मैसेज भी किए, लेकिन न तो ये जांच अधिकारियों ने देखे और न ही आला अफसरों ने।

2011 में तो हद हो गई

बोर्ड में 3 साल हो गए हैं। शुरूआत से छेड़छाड़ होती रही, लेकिन अक्टूबर 2011 में हद हो गई। शिकायत की पर इंसाफ नहीं मिला। अब मैं किसके पास गुहार लगाऊं? जहां जाती हूं अधिकारी अपनी शर्त रखने लगते हैं। - भारती (परिवर्तित नाम), पीड़िता, लिपिक केंद्रीय श्रमिक शिक्षा बोर्ड जोनल ऑफिस, भोपाल

चंद्रशेखर ने नहीं रखा पक्ष

इंदौर बोर्ड ऑफिस के सीनियर क्लर्क चंद्रशेखर कदम से डीबी स्टार टीम बात करने उनके दफ्तर पहुंची तो बताया गया कि वे मेडिकल लीव पर हैं। तब इनके मोबाइल पर दो दिन तक संपर्क किया। घंटी जाती रही, लेकिन जवाब नहीं आया। एसएमएस किया फिर भी कोई जवाब नहीं आया।

ये आरोप सरासर झूठे हैं

ये आरोप सरासर झूठे हैं। दरअसल उस महिला के खिलाफ एक शिकायत मेरे पास आई थी। जिसकी जांच करने के लिए मैंने उन्हें बुलाया था। शिकायत मेरे पास आई थी तो मैंने जांच शुरू कर दी। इस बारे में मैंने दर्वे साहब को भी बता दिया था। आप उनसे बात कर लीजिए। - आर.एस. माथुर रीजनल डायरेक्टर, केंद्रीय श्रमिक शिक्षा बोर्ड आंचलिक निदेशालय, भोपाल

खत्म हो जाएं अपराध


मुलायम चाहें तो 2 मिनट में खत्म हो जाएं अपराध: उमा

लखनऊ/अमर उजाला ब्यूरो
Story Update : Friday, April 20, 2012    12:26 AM
mulayam singh yadav akhilesh crime UP uma bharti
भाजपा की फायर ब्रांड नेता उमा भारती ने समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को तुष्टीकरण और अपराधियों को संरक्षण देने से बाज आने की चेतावनी दी है।

अपराधियों पर नियंत्रण करना चुटकियों की बात
उन्होंने कहा कि बहुमत का महत्व समझते हुए दोनों नेताओं को जिम्मेदार नेता और सरकार के रूप में आचरण करना चाहिए। सपा की सरकार आने के एक महीने के भीतर जिस तरह अपराध और आपराधिक घटनाएं बढ़ी हैं, वे चिंता का विषय हैं। उन्होंने कहा कि मुलायम और अखिलेश के लिए अपराधियों और अपराधों पर नियंत्रण करना चुटकियों की बात हैं। दोनों नेता केवल अपनी पार्टी के लोगों को समझा दें तो दो मिनट में अपराध रुक जाएंगे।

अपराधों की अगुवाई कर रहा है सत्तारूढ़ दल
बृहस्पतिवार को उमा भारती विधानसभा की सदस्यता की शपथ लेने के बाद पत्रकारों से बातचीत कर रही थीं। उन्होंने कहा प्रदेश में सत्तारूढ़ दल अपराधों की अगुवाई कर रहा है। उमा के अनुसार, भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने उन्हें कुछ आवश्यक विचार-विमर्श के लिए रोक लिया था। इस कारण वह सदन में शपथ नहीं ले पाई थी। उन्होंने इन संभावनाओं को नकारा दिया कि वह यूपी की राजनीति से किनारा कर रही हैं।

यूपी में पराजय की जिम्मेदारी मेरे ऊपर
बाबू सिंह कुशवाहा और पराजय के कारणों पर उन्होंने टिप्पणी से इनकार करते हुए कहा कि वह यूपी चुनाव में पराजय की जिम्मेदारी स्वयं के ऊपर लेती हैं। इसके साथ सत्तारूढ़ दल सपा पर हमला बोलते हुए उमा भारती ने कहा कि वह मुलायम से नहीं डरती हैं। प्रदेश में सपा की सरकार बनने के बाद जिस तरह से दहशतगर्दी बढ़ रही है, वह चिंता का विषय है। स्थितियां बिगड़ रही हैं। उन्होंने कहा कि मतगणना के बाद से ही बबीना में घटी घटनाओं से प्रदेश के खतरनाक भविष्य का एहसास हो गया था। बीते एक महीने में कोई दिन ऐसा नहीं है, जिस दिन कोई ऐसी घटना न घटी हो।

शाहरुख जैसा हाल न बनाएं मुसलमानों का
उमा ने मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को चेतावनी दी कि वह मुसलमानों का हाल शाहरुख जैसा न बनाएं। शाहरुख को जिस तरह अमेरिका में झेलना पड़ा, उसके पीछे मुसलमानों को लेकर दुनिया भर में बना आशंका का माहौल है। मुलायम और अखिलेश यूपी में जिस तरह तुष्टीकरण की राह पर आगे बढ़ रहे हैं, उससे उत्तर प्रदेश में भी मुसलमानों का हाल शाहरुख जैसा ही होता जा रहा है। सपा सरकार मुसलमानों और हिंदुओं के बीच भेदभाव और तनाव बढ़ाने वाले फैसले न करे, नहीं तो मुसलमानों को ही दिक्कत होगी। पढ़ाई के लिए पैसा देने में सपा सरकार को हिंदू और मुसलमानों के बीच भेद नहीं करना चाहिए। अंत में उन्होंने कहा कि सपा सरकार मुसलमानों को ही कठघरे खड़ा कर रही है।

रविवार, 15 अप्रैल 2012

राजा भैया के खिलाफ खाद्यान्न घोटाला मामले में सीबीआई शिकंजा कस सकती है।


राजा भैया पर शिकंजा कस सकती है सीबीआई

नई दिल्ली/पीयूष पांडेय
Story Update : Sunday, April 15, 2012    12:54 AM
Raja Bhaiya up case Food Scandal
उत्तर प्रदेश के जेल मंत्री रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के खिलाफ खाद्यान्न घोटाला मामले में सीबीआई शिकंजा कस सकती है।

एजेंसी ने 2004 में खाद्य मंत्री रहे निर्दलीय विधायक के एक पुराने साथी और उनके तत्कालीन जनसंपर्क अधिकारी (पीआरओ) की ओर से लगाए गए आरोपों के आधार पर जांच तेज कर दी है। एजेंसी ने दोनों को इस बाबत लखनऊ कार्यालय भी बुलाया है। शिकायत में राजा भैया पर कई करोड़ रुपये की रिश्वत लेने का गंभीर आरोप लगाया गया है।

प्रतापगढ़, कुंडा से निर्दलीय विधायक राजा के पुराने साथी रहे मनोज कुमार को एजेंसी ने शनिवार को नोटिस जारी कर बयान देने के लिए बुलाया है। जबकि राजा भैया के पीआरओ रहे राजीव कुमार ने जान के खतरे की आशंका दर्शाते हुए सीबीआई से लखनऊ कार्यालय की बजाय उन्हें हेडक्वार्टर दिल्ली में अधिकारियों के समक्ष उपस्थित होने की गुजारिश की है।

मनोज पर कई आपराधिक आरोप हैं। सूत्रों के अनुसार पहले वह राजा के इशारे पर ही काम करते थे। कुमार को भी एजेंसी ने गवाह के तौर पर उपस्थित होकर बयान दर्ज कराने के लिए नोटिस दिया है। कुमार के अनुसार एजेंसी राजा भैया की भूमिका की जांच एक साल से कर रही है। लेकिन उसके पास अब तक कोई ठोस सुबूत नहीं था।

यही वजह थी कि राज्य में बसपा सरकार कार्यकाल के दौरान एजेंसी निर्दलीय विधायक के खिलाफ शिकंजा नहीं कस सकी। लेकिन अब ऐसा संभव हो सकता है, क्योंकि सीबीआई के पास कई ठोस सुबूत और गवाह हैं। कुमार ने सुप्रीम कोर्ट में भी राजा भैया के खिलाफ आवेदन दायर किया है। इस आवेदन पर 13 अप्रैल को सुनवाई होनी थी। लेकिन एजेंसी की ओर से कोई अधिवक्ता पेश न होने पर मामला 26 अप्रैल तक के लिए टल गया।

हालांकि सीबीआई का कोई अधिवक्ता पेश न होने पर अदालत ने एजेंसी को आगाह किया था कि भविष्य में ऐसी हरकत नहीं होनी चाहिए। क्योंकि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में अनियमितता से जुड़ा यह घोटाला बहुत गंभीर मामला है। आवेदन में कुमार ने आरोप लगाया है कि 2004 में जब राजा भैया खाद्य मंत्री थे, तब उन्होंने पीडीएस के राशन की कालाबाजारी से मिले करोड़ों रुपये को कई प्रोजेक्टों में लगाया था।

इन तमाम प्रोजेक्टों का प्रबंधन वह करते थे। इस दौरान उन्होंने मंत्री के निर्देश पर कई बैंकों में भारी रकम जमा करवाई थी। कुमार का आरोप है कि इस धन से लखनऊ, इलाहाबाद और दिल्ली के पॉश इलाकों में कई संपत्तियां खरीदी गई हैं। आवेदन के साथ उन्होंने इसका ब्यौरा अदालत को दिया है।

हाईकोर्ट के आदेश पर शुरू हुई थी जांच
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिसंबर 2010 में खाद्यान्न घोटाले की सीबीआई जांच के आदेश दिए थे। आदेश में यह भी कहा था कि अभियुक्त सरकारी अफसरों के खिलाफ सरकार तीन माह के अंदर मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं देती तो इस देरी को सरकार की मंजूरी माना जाएगा।

सरकारी अफसरों पर मुकदमा चलाने के लिए राज्य सरकार की मंजूरी न लेने के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने बाद में रोक लगा दी थी। करोड़ों रुपये के इस घोटाले में राज्य के एक पूर्व मंत्री आठ माह से जेल में हैं। यूपी सरकार ने हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

15 लाख का पर्स


15 लाख का पर्स रखती हैं मायावती: अखिलेश

लखनऊ/एजेंसी
Story Update : Friday, April 13, 2012    12:47 AM
Mayawati Have a purse of Rs 15 lakh Akhilesh cm up
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अध्यक्ष मायावती 15 लाख रुपये का पर्स रखती हैं।

यादव यहां ईसाबेला थोबर्न आईटी कॉलेज के 125 वर्ष पूरे होने पर आयोजित समारोह को संबोधित कर रहे थे। यादव ने कहा कि उनकी पूर्ववर्ती सरकार ने जहां देखा, वहां मूर्ति लगा दी। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने अपनी भी मूर्तियां लगा दी।

अखिलेश ने कहा कि मूर्तिकार ने मायावती की मूर्ति के साथ उनका पर्स भी बना दिया और पर्स की कंपनी का नाम भी उस पर लिख दिया। उन्होंने कहा कि जिस कंपनी का पर्स वह लेकर चलती हैं उसकी कीमत 15 लाख रुपये से शुरू होती है।

उन्होंने कटाक्ष किया कि आप भरोसा रखिए मैं अपनी मूर्ति नहीं बनवाऊंगा क्योंकि भारतीय संस्कृति के अनुसार जिंदा लोगों की मूर्ति नहीं बनती।

शनिवार, 24 मार्च 2012

बाबा बनाम बलात्कार


बाबा बनाम बलात्कार: कुकुरमुत्तों के तरह पनप रहे हैं भारत में ‘स्वयंभू गुरुजन और स्वामी”

धरा जब जब विकल होती, मुसीबत का समय आता;
कोई किसी रूप में आकर, मानवता की रक्षा करता.”
-शिवनाथ झा।।
नित्यानंद 'बाबा' अपनी फिल्मस्टार शिष्या से मालिश करवाते हुए
आज के परिप्रेक्ष्य में मानवता के रक्षक के रूप में नहीं वरन “भक्षक” के रूप में लोग अवतरित हों रहे हैं विभिन्न नामों से – बाबाओं, विचारकों, प्रचारकों, आध्यात्म गुरुओं, योगियों के रूप में – इतिहास साक्षी है.
स्वतंत्र भारत के जन-मानस के “अंध-विश्वासों” को, विशेषकर महिलाओं को, अपना कवच बनाकर पिछले पांच दशको से भी अधिक से, उनका मानसिक, आर्थिक, शारीरिक और धार्मिक रूप से बलात्कार कर रहे ये “गुरूवर”.
बिग बॉस में स्वामी अग्निवेश और दूसरे कलाकार
सुर्ख़ियों में रहना इन “तथाकथित महात्माओं” का जन्म सिंद्ध अधिकार हों गया है. धन्यवाद के पात्र हैं भारत के लोग, जो मानसिक बिपन्नता के कारण कभी ‘गदगद होकर’ इस बाबाओं और महात्माओं के लिए एक ही समय में ताली भी बजाते हैं और दूसरे ही क्षण अपने गुरुदेव को विभिन्न भारतीय “गालियों” से अलंकृत भी करते हैं.
धीरेंद्र ब्रह्मचारी और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी


भारत के विभिन्न जाँच एजेंसियों के आंकड़ों को यदि समग्र रूप में देखा जाये तो स्वतंत्र भारत में स्वयं-भू अवतरित हुए महान ‘ऋषि’ महर्षि महेश योगी से लेकर जनता के आँखों को रंगीन बनाये रखने के लिए गेडुआ वस्त्र धारण करने वाले स्वयं-भू “स्वामी” अग्निवेश तक, सभी तथाकथित बाबाओं ने, महात्माओं ने, आध्यात्म गुरुओं ने, योग गुरुओं ने जो कभी राजनेताओं के दरवाजे पर उनकी ‘परछाई मात्र’ की प्रतीक्षा में सालों-साल गुजार दिए, कई चाय वालों के पैसे आज तक उधार खाते में दर्ज हैं, आज तक़रीबन 29,000 करोड़ से अधिक के संपत्ति और नकद के मालिक हैं.
अपनी शिष्याओं के साथ खरबपति बाबा महेश योगी
भारत के विभिन्न कार्पोरेट घरानों के व्यवसायों में हिस्सेदार हैं, समाचार पात्र-पत्रिकाओं, टीवी चैनलों में अपना पैसा निवेश किये हुए हैं, कईयों ने अपने प्रचार-प्रसार की समुचित व्यवस्था हेतु अपना ही टीवी चैनल देश विदेशों में खोल रखा है, कुछ खोल रहें है. आज अप्रक्ष रूप से देश चलाने का दावा भी ठोकते हैं, बड़े-बड़े उद्योग घराने के बहु-बेटियों को “संतान प्राप्ति” के लिए “जल और भभूत” भी देते हैं.
कुल मिलाकर दुकान तो “ताज महल” की तरह चल रही है – समानता एक है: ताज की नीव भी कब्र पर है इनकी दुकाने भी भारतीय जन-मानस के शोषित रक्त पर. अंतर सिर्फ इतना है की ‘ताज’ निर्जीव होने के कारण अपने दर्द को कराह नहीं सकता, भारत के लोगों को ‘कराहने की आदत ही नहीं है’, सभी सजीव होते हुए भी निर्जीव के तरह जीना पसंद करते हैं. बाह रे बाबा, बाह रे तेरा वशीकरण मंत्र का प्रभाव.
महेश योगी से लेकर रवि शंकर तक पिछले तीन दशक में ये “तथाकथित बाबाओं और गुरुदेवों” ने जो जो कारनामे किये वह भारतीय नागरिकों, या यूँ कहें, विश्व भर में “कुख्यात” है. आसमान की ऊंचाई में लोगों ने उन्हें उड़ते भी देखा और समय के अवसान के साथ जमीन पर लोटते हुए भी. आज तक एक बात समझ में नहीं आई और वह यह की अगर इन “बाबाओं और गुरुदेवों” में कोई “दिब्य शक्ति” है तो सभी रामचंद्र परमहंश क्यों ना बने जिन्हें माँ काली स्वयं दर्शन देती थी?
दरअसल, ये सभी तथाकथित बाबा, गुरु या इन्हें जो भी नाम से पुकारा जाये, मूलरूप से शाम-दंड-भेद सभी का एक मिश्रित रूप है जो चाटुकारिता, अवसरवादिता या अन्य उपायों के द्वारा भारतीय जन-मानस की सबसे बड़ी कमजोरियों – चाहे वह आध्यात्म से जुड़ा हों, धर्मं से जुड़ा हों, संप्रदाय से जुड़ा हों, स्वास्थ से जुड़ा हों, का अन्य – को अपनी शक्ति बनाकर उनका मानसिक, आर्थिक, शारीरिक, धार्मिक रूप से बलात्कार करते हैं और प्रक्रिया अनवरत है. लेकिन दुर्भाग्य यह है कि भारत के लोग अंधविश्वास में इतने गोंते लगा चुके हैं कि उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. वे मात्र अब “ताली बजाने वाला” ही रह गए हैं – चाहे नौटंकी में बजाएं या खुद नौटंकी करें.
मालिश या गुलछर्रे: बाबा नित्यानंद और फिल्म अभिनेत्री रंजीता
सत्तर के दशक में जब श्रीमती इंदिरा गाँधी पर “शनि की दशा” मर्रा रहा था, इस अवसर का फायदा उठाया महेश योगी ने. आध्यात्म गुरु के रूप में श्रीमती गाँधी से सानिग्धता बढ़ी. भारत सहित विश्व के अन्य देशो में “शांति दूत वाहक” के रूप में अवतरित हुए. विश्व के देशों का भ्रमण किया और पूरे विश्व में हजारों-हजार “तथाकथित” शांति वाहक बनाये. बाद में महेश जोगी “महर्षि महेश योगी” बन गए. कहा जाता है की मृत्यु के समय उनके और उनके द्वारा स्थापित संस्थान को ४०० मिलियन डोल्लर से अधिक की संपत्ति थी. आज उनके परिवार और उनके लोग “शांति बहक” तो नहीं रहे, अलबत्ता, भारत सहित विश्व के अन्य देशों में विद्यालय, अन्य शैक्षणिक संस्थाने, और विभिन्नप्रकार के व्यावसायिक उद्योगों की स्थापना किये, जिसने स्वास्थ, दवाई, ओर्गानिक फार्म आदि सम्मिल्लित हैं, माला-माल हों गए.
सत्तर के दशक में ही एक और योगराज का आभिर्भाव हुआ. इन्होने भारतीय जन-मानस को आध्यात्म नहीं योग सिखाने का ठेका लिया. चुकि उस वक्त रामदेव की उत्पत्ति नहीं हुई थी, इसलिए उन्होंने सीधा निशाना साधा श्रीमती इंदिरा गाँधी को, माध्यम थे आध्यात्म गुरु महेश योगी और उस योग गुरु का नाम था धीरेन्द्र चौधरी, जो बाद में धीरेन्द्र ब्रम्हचारी के नाम से विख्यात हुए. गीता के ज्ञान से प्रभावित चौधरी कार्तिकेय के शिष्य बने और बनारस के समीप ज्ञान प्राप्त किया. सोवियत रूस से वापस आते ही पंडित जवाहरलाल नेहरु ने इन्हें इंदिरा गाँधी को योग सिखाने का भार सौंपा था. गुरु-शिष्य की परंपरा का निर्वाह करते जन सन १९७५-७७ में श्रीमती गाँधी पर फिर से शनि-राहु-केतु ग्रहों का प्रभाव उमर पड़ा, धीरेन्द्र चौधरी, जो अब तक धीरेन्द्र ब्रम्हचारी बन गए थे, इंदिरा जी के समीप आते गए और तत्कालीन सत्ता के गलियारे में बहुत ही शसक्त व्यक्ति के रूप में अवतरित हुए. तीस वर्षों के “तथाकथित योग साधना के दौरान, धीरेन्द्र ब्रम्हचारी ना केवल जम्मू में आर्म्स निर्माण करने के उद्योग लगाये (अब सरकार का है) बरन हजारों-हजार एकड़ क्षेत्र में अपना फार्म हाउस बनाया, निजी हेलिकोप्टर रखा, हेली-पैड बनाया, वन-प्राणी का निवास स्थान बनाया, जम्मू में सात-मंजिला मकान बनाया.
धीरेन्द्र ब्रह्मचारी को लोग “फ्लाईंग स्वामी” के नाम से भी जानते थे. अन्वेषण विभाग के लोगों का कहना है की धीरेन्द्र ब्रह्मचारी अवैध आर्म्स डील के अरितिक्त, कई ऐसे गैर-क़ानूनी क्रिया कलापों में लिप्त थे जो “गुरु” शब्द को कलंकित करता है. बहरहाल, अगर सूर्योदय हुआ तो सूर्यास्त भी होगा. यही प्रकृति का नियम है. धीरेन्द्र चौधरी या धीरेन्द्र ब्रह्मचारी का जीवन एक “विचित्र परिस्थिति” में एक निजी विमान दुर्घटना में हुआ. आज तक भारत के लोग उस गुत्थी को सुलझा नहीं पाए.
इंदिरा गाँधी के प्रधान मत्री काल में ही एक और स्वामी अवतरित हुए जिनका वास्तविक विकास तत्कालीन प्रधान मंत्री पी.वि. नरसिम्हा राव के समय हुआ और वे हैं स्वयं-भू स्वामी चंद्रास्वामी. तंत्र विद्या में महारथ प्राप्त चंद्रास्वामी भारतीय राजनैतिक पट पर एक “लालिमा” के तरहव्तरित हुए, लेकिन मंत्रो का प्रभाव कुछ विपरीत पड़ा उनपर. वैसे कामाख्या, जहाँ लोग तंत्र-मंत्र सिद्ध करते हैं, की यह प्रथा भी है कि “अगर तंत्र-मन्त्रों का प्रयोग जन-हित में ना हों, तो उसका विपरीत प्रभाव तांत्रिक पर पड़ता है”, और कुछ ऐसा ही हुआ चंद्रास्वामी पर. राजीव गाँधी हत्या कांड सहित कई कुख्यात और गैर क़ानूनी धंधों में इनका नाम आया. लन्दन से लेकर विश्व के अनेकों देशों में ठगी – ठगाने के कार्यों में भी पाए गए. वैसे, भारत के कई जाँच पड़ताल करने वाले एजेंसियों के फायलों में इनका नाम अभी भी दर्ज है, लेकिन कुछ दिन पूर्व भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ मुकदमों में इन्हें मुक्त कर दिया है और इन्हें विदेश जाने पर लगी पावंदी को भी उठा लिया है.
अस्सी के दशक के पूर्वार्ध एक और स्यंभू स्वामी अवतरित हुए – हिन्दू सामाजिक सेवक के रूप में, आर्य समाज के ज्ञान को बढ़ाबा देने. सामाजिक सेवक होना और नाम के आगे ‘स्वामी’, बात्वाही हुई हैसे ‘सोना में सुहागा’. हरियाणा में पहला प्रवेश मारा राजनीति में – नाम है अग्निवेश. सन १९७९-१९८२ तक हरियाणा राज्य में शिक्षा मंत्री रहे. राजनीति में भविष्य को ‘अधर में लटके’ देख एक संस्था खोला और बंधुआ मजदुर पर काम करने लगे, उनके मुक्ति के लिए. यह अलग बात है कि उनके कार्यालय में आज भी १४ साल से काम उम्र के बच्चे कार्य करते हैं अपने पेट कि भूख को मिटाने.
जैसे-जैसे मजदूरों के लिए सरकार कि नीतियाँ बदलती गयी और मजदूरों को उचित मजदूरी के साथ साथ ज्ञान भी मिलने लगा, अग्निवेश साहेब, भष्टाचार के खिलाफ छिड़े जंग में कूद पड़े. कुल मिलाकर अखबार के पन्नों पर, टीवी चैनलों पर आना इन्हें अच्छा लगता है. इतना ही नहीं, स्वामी जी अभी अभी बिग-बॉस में भी मोहतरमाओं के सानिग्धता में तीन दिन बिताये हैं. वैसे देश के विभिन्न जांच एजेंसियों कि नजर इनकी हरकतों पर है, देखते हैं आगे क्या होता है?
इस दशक के पूर्वार्ध एक और योग गुरु अवतरित हुए भारतवासियों को ज्ञान दें. राम कृष्ण यादव. पहले तो रामदेव बने, फिर स्वामी रामदेव और अब बाबा रामदेव. इसमें कोई संदेह नहीं है कि रामदेव जी ने भारतीय योग ज्ञान को एक नई दिशा दी है, लेकिन अनवरत दिशा-भ्रष्ट होना, आने वाले दिनों के लिए शुभ-संकेत नहीं है. वैसे देश के विभिन्न जांच एजेंसियों कि नजर इनकी हरकतों पर आ टिकी है. दस वर्षों से भी काम कि अवधि में विश्व भ्रमण करने के अतिरिक भारतीय राज नेताओं, शाशकों, उद्योगपतियों, विशेषकर भारतीय मूल के विदेशों में रह रहे लोगों में इनकी पहुँच प्रशांत महासागर से भी अधिक गहरा है. कहा जाता है कि इनके पास किता धन है या इन्होने कहाँ कहाँ अपने धनों का निवेश किया है, किसी को पता नहीं. आगे समय बताएगा.
अंत में एक और स्वयंभू आध्यात्म गुरु से मिलिए. भारतीय गुरुओं के इतिहास में शायद यह पहले “गुरु” होने जीने नाम के आगे दो बार “श्री” लगता है. नाम है रवि शंकर. आध्यात्म गुरु और भारत के अतिरिक विश्व के लोगों को “जीने का तरीका” बताते हैं और संस्थापक है “आर्ट ऑफ़ लिविंग फ़ौंडेशन” के. महेश योगी के शिष्य हैं, विश्व का कोई ही हिस्सा होगा जहाँ इनका पदार्पण नहीं हुआ हों. चाहे नंदी ग्राम (पश्चिम बंगाल) में निर्मम हत्या हों या दिल्ली के रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन, सभी जगह मिलेंगे आपको. लोगों के दिलों-दिमाग पर पड़ने वाले कुश्प्रभावों को अपने “जीने के रहष्य” के माध्यम से सुलझाते है. विश्वभर में कई संस्थाओं के स्वामी हैं. “सफ़ेद वस्त्र” इनका सबसे प्रिय है. बहुत मृदु-भाषी है. लोगों का मानना है कि “इनकी यही मीठी बोली लोगों के लिए प्राण घाती होते हैं”.
“संदेहास्पद” प्रारंभ से रहे हैं इसलिए देश के विभिन्न जांच एजेंसियों कि नजर इनकी हरकतों पर होना लाजिमी है.
सबसे बड़ी बिडम्बना यह है कि आज के ये सभी स्यंभू-गुरु, स्वामी “गुरु-शिष्य” परंपरा में विश्वास नहीं रखते. कोई भी ऐसे गुरु नहीं दीखते जो अपने ज्ञान, साधना को अपने किसी उत्तराधिकारी को सौंपने का प्रयास कर रहे हों. “संस्थाएं” इनके “विरासत” के रूप में पनप रही हैं. अब तय तो भारत के आवाम को करना है कि वह खुद को इस काबिल स्वयं बनाये तो अपना जीवन अपने तरीके से जिए, अपने आध्यात्म के साथ, या फिर समर्पित कर दे स्वयंभू गुरुओं, स्वामियों के समक्ष शोषित होने.