रविवार, 20 नवंबर 2011

बसपा का आंतरिक भ्रष्टाचार

(अमर उजाला से साभार)

बाबू सिंह की बगावत, कहा- जान को खतरा

लखनऊ।
Story Update : Sunday, November 20, 2011    12:45 AM
मुख्यमंत्री मायावती के करीबी रहे पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा ने अपनी ही सरकार के एक मंत्री से जान का खतरा होने की बात कह कर सनसनी फैला दी है। उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि लोक निर्माण और स्वास्थ्य मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी, कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह और प्रमुख सचिव (गृह) कुंवर फतेह बहादुर से उनकी जान को खतरा है।

एनआरएचएम घोटाले में भी संगीन आरोप
बसपा सरकार में परिवार कल्याण और सहकारिता मंत्री रहे बाबू सिंह कुशवाहा को दो सीएमओ की हत्या के बाद 7 अप्रैल को इस्तीफा देना पड़ा था। उन पर एनआरएचएम घोटाले में भी संगीन आरोप हैं। कुशवाहा ने यह चिट्ठी 17 नवंबर को लिखी है। विधानसभा सत्र से ठीक पहले सामने आई इस चिट्ठी में कुशवाहा ने मुख्यमंत्री से अपना दर्द बयान किया है। उन्होंने प्रधानमंत्री, राज्यपाल, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, सीबीआई निदेशक और प्रमुख सचिव (गृह) भारत सरकार के पास भी पत्र भेजा है।

सीएम से जान की रक्षा करने की अपील की
सीएम को लिखे पत्र में कुशवाहा ने कहा है कि 2007 में बसपा की सरकार बनने पर मुझे कैबिनेट मंत्री बनाया गया और परिवार कल्याण समेत कई विभागों का चार्ज सौंपे गए। इससे सिद्दीकी, कुछ अन्य मंत्री, कैबिनेट सचिव, प्रमुख सचिव (गृह) और कुछ अन्य प्रशासनिक अफसर मुझसे ईर्ष्या करने लगे। पूर्व मंत्री ने आगे लिखा है कि मुझे डर है कि ये ताकतवर लोग सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करके मुझे, मेरे रिश्तेदारों और समर्थकों को फर्जी मामलों में फंसा सकते हैं। हाल ही में बांदा और झांसी में मेरे खिलाफ में घटी ताजा घटनाओं से इस बात की आशंका और बढ़ गई है। इसके साथ ही कुशवाहा ने मुख्यमंत्री से पूरे मामले पर ध्यान देने और अपनी जान की रक्षा करने की अपील की है।

कद्दावर नेताओं में होती थी गिनती
बाबू सिंह कुशवाहा की गिनती बसपा के कद्दावर नेताओं में होती रही है। इस्तीफा देने से पहले वे मुख्यमंत्री मायावती के सबसे करीबी और विश्वासपात्र माने जाते थे। बसपा में उनके दबदबे का पता इसी से चलता है कि प्रदेश में एनआरएचएम के लिए जब केंद्र से पैसा आने लगा तो उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर न सिर्फ परिवार कल्याण को स्वास्थ्य विभाग से अलग कराकर स्वतंत्र मंत्रालय बनवा दिया, बल्कि खुद इस विभाग की कमान अपने हाथ में ले ली। बांदा में स्थानीय राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के चलते नसीमुद्दीन सिद्दीकी से उनका पहले से ही छत्तीस का आंकड़ा है। मुख्यमंत्री की ‘गुडबुक’ से बाबू सिंह का पत्ता साफ होने के बाद अब उनकी जगह नसीमुद्दीन ने ले ली है।

कांग्रेस में जाएंगे कुशवाहा!
बसपा से बगावत करने के बाद बाबू सिंह कुशवाहा के कांग्रेस में जाने की अटकलें शुरू हो गई हैं। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा जोरों पर है कि कुशवाहा कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं के संपर्क में हैं। जल्द ही वह कांग्रेस में शामिल होने की घोषणा कर सकते हैं।

क्या लिखा चिट्ठी में
अप्रैल 2011 में मेरे मंत्री पद से इस्तीफा देते ही नसीमुद्दीन सिद्दीकी और दो आला अधिकारी मुझसे व्यक्तिगत रंजिश निकालने लगे। इन तीनों ताकतवर लोगों की दुर्भावना अब इतनी बढ़ गई है कि ये मेरे खिलाफ कोई भी साजिश रच सकते हैं। मुझे इन तीनों से जान का खतरा है।

बाबू सिंह कुशवाहा द्वारा कैबिनेट मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी और आला अधिकारियों से अपनी जान का खतरा बताया जाना गलत है। कुशवाहा आय से अधिक संपत्ति के मामले में लोकायुक्त जांच में फंसे हैं। हाईकोर्ट में भी उनके खिलाफ एक याचिका दाखिल है। चारों ओर से कानून के शिकंजे में घिरे होने की वजह से वे लोगों का ध्यान हटाने के लिए ड्रामेबाजी कर रहे हैं।
-स्वामी प्रसाद मौर्य, प्रदेश बसपा अध्यक्ष
(हिंदुस्तान से साभार)

पूर्व बसपा मंत्री ने कहा, मंत्री से जान को खतरा
लखनऊ, एजेंसी
First Published:19-11-11 09:57 PM
Last Updated:20-11-11 01:32 AM
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उत्तर प्रदेश में बुहजन समाज पार्टी (बसपा) की सरकार के पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा ने मुख्यमंत्री मायावती को लिखे पत्र में जहां कथित रूप से राज्य के शीर्ष अधिकारियों और एक मंत्री से अपनी जान को खतरा बताया है। वहीं, बसपा ने शनिवार को कुशवाहा के आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि वह नौटंकी कर रहे हैं।
ज्ञात हो कि पूर्व परिवार कल्याण मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा ने मायावती को लिखे पत्र में कथित रूप से राज्य के लोक निर्माण मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दिकी और कैबिनेट सचिव एवं गृह सचिव से अपनी जान को खतरा होने की बात कही है।
वहीं, कुशवाहा के आरोपों का खंडन करते हुए बसपा प्रवक्ता स्वामी प्रसाद मौर्य ने एक बयान जारी कर कहा, ‘कुशवाहा के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति मामले में लोकायुक्त की जांच चल रही है। ऐसा लग रहा है कि कानूनी शिकंजा कसने के बाद लोगों का ध्यान हटाने के लिए वह इस तरह की नौटंकी पर उतर आए हैं।’
कुशवाहा के कथित पत्र पर आश्चर्य प्रकट करते हुए मौर्य ने इसका खंडन किया और कहा कि उनकी जान को मंत्रिपरिषद के किसी सदस्य अथवा सरकार के किसी अधिकारी से खतरा नहीं है। मौर्य ने कहा, ‘कुशवाहा कई सालों तक मंत्री थे तब उन्हें इन लोगों से जान का खतरा क्यों नहीं था। पिछले कुछ दिनों से उन्हें अपनी जान को खतरा महसूस होने लगा है जो आश्चर्य की बात है।’
उन्होंने कहा कि कुशवाहा का कथित पत्र अभी तक मुख्यमंत्री को नहीं मिला है लेकिन यह पत्र समाचार चैनलों पर दिखाया गया जिससे साबित होता है कि कुशवाहा पेशबंदी में लगे हैं। एनएचआरएम योजना में अनियमितताओं के खुलासा के बाद कुशवाहा ने इस्तीफा दे दिया था।
(दैनिक जागरण से साभार)

बाबू सिंह कुशवाहा हुए बागी

Nov 19, 09:22 pm
लखनऊ [जाब्यू]। मुख्यमंत्री मायावती के बेहद विश्वासपात्र समझे जाने वाले बाबू सिंह कुशवाहा ने शनिवार को बगावती तेवर अपना लिए। उन्होंने कैबिनेट मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी, कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह और प्रमुख सचिव गृह कुंवर फतेह बहादुर से अपनी जान को खतरा बता दिया है।
मुख्यमंत्री को भेजे पत्र की प्रतिलिपि उन्होंने प्रधानमंत्री, राज्यपाल, सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, सीबीआइ के निदेशक व केंद्रीय गृह सचिव भेजी है। उमूमन हिंदी में खत-ओ-किताबत करने वाले कुशवाहा ने पत्र अंग्रेजी में लिखा है। कुशवाहा मायावती सरकार में कद्दावर मंत्री हुआ करते थे। एनआरएचएम में घोटाला उजागर होने के बाद इसी साल अप्रैल में मंत्रिमंडल से उनका इस्तीफा हुआ था।
यह पत्र सार्वजनिक होते ही उत्तर प्रदेश की सियासत में गर्मी बढ़ गई है। बाबू सिंह कुशवाहा जैसे विश्वासपात्र के बागी होने के राजनीतिक निहितार्थ तलाशे जा रहे हैं। कुशवाहा को इस हद जाने की हिम्मत देने के पीछे कौन हो सकता है, इसके कयास लगाए जा रहे हैं। बड़े कांग्रेसी नेता के कुशवाहा के सम्पर्क में होने की बात कही जा रही है। कुशवाहा अपने ऊपर बढ़ते शिकंजे से खासे परेशान हैं। सीबाआइ तो उनके ऊपर शिंकजा कस ही रही है, लोकायुक्त ने भी जांच शुरू कर दी है। शैक्षिक प्रमाणपत्रों में उनका नाम कुछ और होने को लेकर दायर याचिका पर कोर्ट ने आदेश जारी कर दिया है। ऐसे में वह सरकार और बसपा से अपने साथ खड़े होने की उम्मीद लगा रहे थे लेकिन बसपा और सरकार ने उनसे पूरी तरह से किनारा कर लिया।
नसीमुद्दीन सिद्दीकी से उनकी काफी समय पहले से राजनीतिक प्रतिद्वन्दि्वता चल रही है। उन्हें यह लग रहा था कि सिद्दीकी ने ही कुछ शीर्ष अफसरों के साथ 'लाबिंग' कर उन्हें किनारे कर दिया है। फिलवक्त उन्हें पार्टी और सरकार से कोई मदद नहीं मिल सकती। सूत्रों के अनुसार ऐसे में उन्होंने अपने कुछ राजनीतिक हितेषियों के जरिये कांग्रेस में सम्पर्क साधा। एक बड़े कांग्रेसी नेता ने दो टूक कह दिया कि जब तक वह बसपा और मायावती के साथ खड़े हैं, उनके साथ किसी तरह की सहानुभूति या मदद का सवाल ही नहीं खड़ा होता। ऐसे में बाबू सिंह कुशवाहा के लिए बसपा से दूरी बनाना मजबूरी हो गई।
सरकार के लिए बेचैनी की वजह यह है कि कुशवाहा ने यह कदम उस वक्त उठाया है जब एक दिन बाद ही विधानमंडल दल का सत्र शुरू होने जा रहा है। लेखानुदान के साथ-साथ विपक्ष अपने अविश्वास प्रस्ताव पर सरकार के बहुमत की परीक्षा लेने की तैयारी में है। उसकी नजर बसपा के उन विधायकों पर है जिनके टिकट कट गए हैं या कटने की सम्भावना है। ऐसे विधायकों की संख्या दो दर्जन से ऊपर बतायी जाती है। कुशवाहा की यह बगावत असंतोष की आग में घी काम कर सकती है। इसी वजह से सरकार में भी बेचैनी है।
ड्रामेबाजी कर रह हैं: बसपा
लखनऊ [जाब्यू]। बहुजन समाज पार्टी ने बाबू सिंह कुशवाहा की बगावत को ड्रामेबाजी करार दिया है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य की ओर जारी लिखित बयान में कहा गया कि कुशवाहा काफी दिनों से पार्टी से जुड़े रहे और सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे। सरकार में मंत्री रहते हुए उन्हें नसीमुद्दीन सिद्दीकी, कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह तथा प्रमुख सचिव गृह कुंवर फतेह बहादुर से जान का कोई खतरा नहीं था। कुशवाहा जब मंत्रिपरिषद से बाहर हुए तब भी काफी लम्बे समय तक इन्हें कोई खतरा नजर नहीं आया। लेकिन अचानक इन लोगों से कुशवाहा को अपनी जान का खतरा कैसे नजर आने लगा, यह आश्चर्य की बात है। प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि कुशवाहा जब कानून के शिकंजे में आ गए हैं तो लोगों का ध्यान हटाने के लिए ड्रामेबाजी कर रहे हैं। कुशवाहा अब न तो पार्टी के सक्रिय सदस्य हैं और न ही पार्टी के कार्यक्रम या आयोजन में इनकी कोई भूमिका ही होती है। कुण्ठाग्रस्त होकर वे बेबुनियाद आरोप लगाकर सहकर्मियों एवं शासन के वरिष्ठ अधिकारियों को बदनाम करने की घिनौनी हरकत कर रहे हैं। उनको लोकायुक्त के विचाराधीन अपने आय से अधिक मामले में हाईकोर्ट में दाखिल जनहित याचिका पर कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए सहयोग करना चाहिए था।
कुशवाहा के पत्र का मूल पाठ
महोदया,
जैसा कि आप जानती हैं कि आवेदक एक सामाजिक कार्यकर्ता है जिसे 2007 में बहुजन समाज पार्टी के सत्ता में आने पर आपने ही कैबिनेट मंत्री नियुक्त किया था और परिवार कल्याण समेत विभिन्न विभागों का चार्ज सौंपा था। परिवार कल्याण विभाग के दो मुख्य चिकित्सा अधिकारियों की हत्याओं की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए आवेदक ने सात अप्रैल 2011 को कैबिनेट मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। 2007 में बसपा के सत्तारूढ़ होते ही नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे कुछ प्रभावशाली मंत्री, कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह व प्रमुख सचिव गृह कुंवर फतेह बहादुर जैसे मौजूदा सरकार के कुछ च्च्च पदस्थ नौकरशाह आवेदक से सदैव ईष्र्या करते थे और व्यक्तिगत रंजिश रखते थे। अप्रैल 2011 में आवेदक के कैबिनेट से इस्तीफा देते ही यह प्रभावशाली व्यक्ति व्यक्तिगत हिसाब बराबर करने के लिए उसके खिलाफ एकजुट हो गए। आवेदक को यह आशंका है कि यह तीनों व्यक्ति उसे, रिश्तेदारों और समर्थकों को झूठे कल्पित मामलों में फंसाकर सार्वजनिक जीवन में उसकी छवि धूमिल करने के लिए अपने प्रभावशाली पद व सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर सकते हैं, जैसा कि बांदा और झांसी की हाल की घटनाओं से विदित हुआ है।
यह तीनों व्यक्ति आवेदक से इस हद दुश्मनी रखते हैं कि आवेदक को आशंका है कि तीनों उसके खिलाफ षड्यंत्र रच सकते हैं और उनसे उसे जान का खतरा भी है। आपसे आग्रह है कि आप इस मामले को देखें और इन तीनों को ऐसी गतिविधियों में लिप्त न होने का निर्देश दें जिससे कि आवेदक को अनावश्यक और गैरकानूनी तरीके से सार्वजनिक जीवन में बदनामी न झेलनी पड़े और उसके जीवन की रक्षा भी हो सके।
भवदीय
बाबू सिंह कुशवाहा

रविवार, 30 अक्टूबर 2011

अमर सिंह ने कहा उनको सपा से न जोड़ा जाय !

अमर सिंह को एम्स से मिली छुट्टी
 रविवार, 30 अक्तूबर, 2011 को 14:53 IST तक के समाचार
अमर सिंह
अस्पताल से निकलने के बाद अमर सिंह ने कहा कि मीडिया उनका नाम समाजवादी पार्टी से न जोड़े.
राज्यसभा सदस्य और समाजवादी पार्टी के पूर्व महासचिव अमर सिंह को दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) से स्वास्थ्य में सुधार होने के बाद रविवार को छुट्टी मिल गई है.
अस्पताल से निकलने के बाद उन्होंने पत्रकारों से कहा कि मीडिया उनका नाम किसी भी रूप में समाजवादी पार्टी से न जोड़े. इस मौके पर उनके साथ जयाप्रदा भी मौजूद थीं.
उन्होंने कोर्ट से इलाज के लिए सिंगापुर जाने की भी अनुमति मांगी है.
उन्होंने कहा कि वह पहले भी अपने स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के चलते सिंगापुर जाते रहे हैं, इसलिए उन्हें आशा है कि इलाज के लिए कोर्ट उन्हें सिंगापुर जाने की अनुमति दे देगा.
नोट के बदले वोट मामले में आरोपी सिंह का गुर्दे संबंधी परेशानियों का उपचार चल रहा था.
उन्हें तिहाड़ जेल से 12 सितंबर को एम्स में भर्ती कराया गया था. दिल्ली हाईकोर्ट ने कुछ दिन पहले उन्हें जमानत दे दी थी.
छह सितंबर को अमर सिंह को वोट के बदले नोट मामले में गिरफ्तार किया गया था.

मंगलवार, 6 सितंबर 2011

अमर सिंह गिरफ़्तार, न्यायिक हिरासत में

अमर सिंह को नाहक फसाया जा रहा है 
डॉ.लाल रत्नाकर 
साभार बी बी सी से -




अमर सिंह
अमर सिंह कहते रहे हैं कि वे निर्दोष हैं
'नोट के बदले वोट' मामले में नाटकीय घटनाक्रम में समाजवादी पार्टी के पूर्व महासचिव और राज्यसभा के सांसद अमर सिंह को गिरफ़्तार करके 19 सितंबर तक की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया गया है.
उनके साथ ही भारतीय जनता पार्टी के दो पूर्व सांसदों, फ़ग्गन सिंह कुलस्ते और महाबीर सिंह भगोरा को भी न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है.
इस मामले में वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के पूर्व सलाहकार सुधीन्द्र कुलकर्णी के ख़िलाफ़ भी सम्मन जारी किया गया था लेकिन वे अदालत में नहीं पहुँचे क्योंकि वे देश से बाहर हैं.
इन चारों के ही ख़िलाफ़ 'नोट के बदले वोट' मामले में दिल्ली पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल किया था.
इस मामले में दिल्ली पुलिस शामिल भाजपा के मौजूदा सांसद अशोक अर्गल के ख़िलाफ़ भी मामला दर्ज करना चाहती है और इसके लिए लोकसभा के अध्यक्ष से अनुमति मांगी गई है.
भाजपा और अन्य विपक्षी दलों ने इन गिरफ़्तारियों के बाद कहा है कि जाँच इस बात की भी होनी चाहिए कि वोट ख़रीदे जाने से किसे लाभ पहुँचा.
जबकि कांग्रेस ने कहा है कि उन्हें सरकार बचाने के लिए वोटों की ज़रुरत ही नहीं थी.

ज़मानत याचिका ख़ारिज

नोट लहराते सांसद
भाजपा ने अपने सांसदों को नोट के साथ संसद में भेजने का फ़ैसला किया था
पहले कहा जा रहा था कि अमर सिंह अदालत में नहीं आ रहे हैं क्योंकि उन्होंने अपनी बीमारी की वजह से अदालत में पेश होने से छूट का आवेदन किया था.
लेकिन वे अचानक तीस हज़ारी कोर्ट में उपस्थित हुए और उन्होंने अपने गुर्दे की बीमारी का हवाला देते हुए ज़मानत देने की अपील की. अदालत ने उनसे बीमारी से संबंधिक ताज़ा कागज़ात मांगे तो उन्होंने कहा कि ये कागज़ात लाने के लिए समय चाहिए होगा.
इस पर तीस हज़ारी कोर्ट की विशेष जज संगीता धींगरा ने उनकी ज़मानत याचिका ख़ारिज करते हुए उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया.
अदालत के इस फ़ैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अमर सिंह के वकील ने कहा कि अमर सिंह के ख़िलाफ़ अभियोजन पक्ष के पास को ठोस सबूत नहीं है.
उनका कहना था, "चार्ज शीट में हमारे ख़िलाफ़ कुछ है ही नहीं तो हम क्या कहें, हमारे ख़िलाफ़ सिर्फ़ सह-अभियुक्त का बयान भर है जिसकी क़ानून की नज़र में कोई अहमियत नहीं है. क़ानून ये कहता है कि इस बयान पर सबूत जुटाया जाना चाहिए वरना इसकी कोई अहमियत नहीं है."
उनका कहना है कि वे जल्दी ही बीमारी के आधार पर अंतरिम ज़मानत की याचिका लगाएँगे और 19 सितंबर को नियमित ज़मानत का आवेदन करेंगे.

भाजपा भी नाराज़

हम अगर भ्रष्टाचार करते तो हम क्या टीवी कैमरा लगवाते या पार्लियामेंट के भीतर आते ये बताने के लिए कि कांग्रेस की सरकार किस तरह से बच रही है. पूरे देश को मालूम है कि जब मनमोहन सिंह की सरकार अल्पमत में आ गई थी तो उसके क्या-क्या हथकंडे अपनाए, उसी के कारण ये सब हो रहा है
अशोक अर्गल, भाजपा सांसद
इस गिरफ़्तारी से भाजपा के दो पूर्व सांसदों फग्गन सिंह कुलस्ते और महाबीर सिंह भगोरा के वकील संजीव सोनी भी नाख़ुश दिखे.
उनका कहना है कि जिन लोगों ने भ्रष्टाचार को उजागर करना चाहा उन्हें ही मुल्ज़िम बना दिया गया है, "आजकल ये चल रहा है कि जो भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है वही कहीं न कहीं भ्रष्टाचार के मामले में फँसा दिया जाता है, तो यही हुआ है. जो लोग विसिल ब्लोवर थे, जो ये पैसा नहीं रखना चाहते थे उन्हें ही मुल्ज़िम बना दिया गया है."
भाजपा के नेताओं ने भी सवाल उठाया है कि जिन्होंने मामले को उजागर किया उन्हें पकड़ लिया गया और जिसने घूस दी उन्हें भी पकड़ लिया गया लेकिन जिसकी सरकार बची और जिसे फ़ायदा हुआ उसकी जाँच नहीं की जा रही है.
संसद में नोट लहराने वाले सांसदों में से एक अशोक अर्गल ने कहा, "हम अगर भ्रष्टाचार करते तो हम क्या टीवी कैमरा लगवाते या पार्लियामेंट के भीतर आते ये बताने के लिए कि कांग्रेस की सरकार किस तरह से बच रही है. पूरे देश को मालूम है कि जब मनमोहन सिंह की सरकार अल्पमत में आ गई थी तो उसके क्या-क्या हथकंडे अपनाए, उसी के कारण ये सब हो रहा है."
यही सवाल सीपीएम और सीपीआई ने भी उठाए हैं.
ये मामला वर्ष वर्ष 2008 का है जब वाम दलों के समर्थन वापस लेने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार के विश्वास प्रस्ताव पर मतदान होना था.
ये अटकलें लगाई जा रही थीं कि यूपीए की सरकार बचेगी या नहीं और बहुमत किस तरह से जुटेगा.
कांग्रेस को वोट की ज़रुरत नहीं थी, आप रिकॉर्ड निकाल कर देखिए कि कितने वोटों से कांग्रेस जीती थी. इनके एक-दो वोटों की हमें क्या ज़रुरत थी. कचहरी में मसला है, साबित हो जाएगा सब कुछ
पवन बंसल, संसदीय कार्यमंत्री
22 जुलाई को मतदान से कुछ घंटे पहले ही भाजपा के तीन सांसदों ने लोक सभा में नोटों की गड्डियां पेश की. इन तीन सांसदों अशोक अर्गल, फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर भगोरा का आरोप था कि अमर सिंह के सहयोगियों ने विश्वास मत में हिस्सा न लेने के लिए उन्हें एक करोड़ रूपए रिश्वत में दिए गए.
तहक़ीकात के बाद दिल्ली पुलिस इस नतीजे पर पहुंची कि अमर सिंह ने सांसदों का समर्थन ख़रीदने की योजना ज़रूर बनाई थी लेकिन पुलिस ये नहीं बता पाई है कि आख़िर वे सरकार को मदद करने के लिए ऐसी योजना क्यों बनाऐंगे जिस सरकार को उनकी पार्टी ने केवल बाहर से समर्थन दिया था.
आरोप है कि इन तीन सांसदों को तीन-तीन करोड़ रूपए देने की पेशकश गई थी. एडवांस के तौर पर मतदान से पहले उन्हें एक करोड़ रूपए दिए गए थे.
सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में पुलिस की तहक़ीकात चल रही है. अदालत का कहना है कि अब पुलिस के लिए ये ज़रूरी है कि वो इन पैसों के स्रोत का पता करे.
लेकिन कांग्रेस ने आज इस आरोप को सिरे से ख़ारिज कर दिया कि इस मामले से उसका कोई लेना देना है.
कांग्रेस नेता और संसदीय कार्यमंत्री पवन बंसल, "कांग्रेस को वोट की ज़रुरत नहीं थी, आप रिकॉर्ड निकाल कर देखिए कि कितने वोटों से कांग्रेस जीती थी. इनके एक-दो वोटों की हमें क्या ज़रुरत थी. कचहरी में मसला है, साबित हो जाएगा सब कुछ."
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा दिया है कि वह अब इस मामले की निगरानी नहीं करेगी लेकिन दिल्ली पुलिस को सख़्त हिदायत दी है कि वह उस पैसे के स्रोत का पता लगाए जो उस दिन संसद में लहराए गए थे.
आज की राजनीतिक प्रतिक्रियाओं से तो लगता है कि अब ये मामला अदालतों के बाहर भी बराबर लड़ा जाएगा

शनिवार, 27 अगस्त 2011

माया पलटीं, कहा जनलोकपाल के साथ नहीं

(अमर उजाला से साभार)

माया पलटीं, कहा जनलोकपाल के साथ नहीं

लखनऊ।
Story Update : Saturday, August 27, 2011    12:28 AM
अन्ना के आंदोलन का समर्थन करने का ऐलान कर चुकीं बसपा सुप्रीमो और मुख्यमंत्री मायावती शुक्रवार को पलट गईं। शुक्रवार को आननफानन बुलाई गई प्रेस कांफ्रेंस में मुख्यमंत्री ने साफ कि या कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ तो हैं पर अन्ना के जन लोकपाल बिल के साथ नहीं। पूरे मामले पर तीखे तेवर अपनाते हुए उन्होंने अन्ना हजारे को अगला लोकसभा चुनाव लड़ अपनी मर्जी का लोकपाल बिल पास कराने की सलाह दे दी।

केवल बड़े अफसरों को ही शामिल करना चाहिए
शुक्रवार को मायावती ने केंद्र सरकार से कहा है कि लोकपाल संस्था में अनुसूचित जाति, जनजाति और अल्पसंख्यकों को डॉ. अंबेडकर की मंशा के अनुरूप प्रतिनिधित्व दे। यही नहीं बिल की मसौदा कमेटी में भी दलितों और सभी धर्मों के लोगों को प्रतिनिधित्व देने का मसला उन्होंने उठाया। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि इसके बिना वह संसद में लाए गए लोकपाल बिल को समर्थन नहीं देगी। उन्होंने कहा कि नया लोकपाल बिल संविधान के दायरे में ही बनना चाहिए और लोकपाल संस्था के दायरे में इसमें केवल बड़े अफसरों को ही शामिल करना चाहिए।

अन्ना का अनशन खत्म कराया जाना चाहिए
यही नहीं मायावती ने केंद्र सरकार को आगाह किया है कि कुछ जातिवादी और सांप्रदायिक ताकतें देश के संविधान को बदलने की कोशिश में अंदर ही अंदर कुछ कर रही हैं। मायावती ने कहा कि अन्ना हजारे की टीम को चाहिए कि वह अब आंदोलन करने के बजाए 2014 के लोकसभा चुनाव में उतरें और अपनी सरकार बना कर अपनी मर्जी का लोकपाल बिल पास कराएं। मायावती ने कहा अन्ना हजारे के आंदोलन की आड़ में एनडीए व यूपीए बीच जो चूहे-बिल्ली का खेल चल रहा है वह अब बंद होना चाहिए और अन्ना का अनशन खत्म कराया जाना चाहिए।

जनलोकपाल बिल पर जाहिर की राय
मायावती ने कहा कि लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री और न्यायपालिका का लाने का सवाल है तो जो निर्णय आम सहमति से होगा बसपा उसका समर्थन करेगी। मायावती ने कहा लोकपाल बिल में संपूर्ण सरकारी तंत्र को लाने की बात है तो उच्च पदों पर बैठे लोगों को ही इसके दायरे में लाया जाना ठीक है। ऊंचे पदों पर बैठे लोग यदि भ्रष्टाचार से मुक्त होंगे तो वे निचले स्तर पर पर भ्रष्टाचार पर रोक लगा सकेंगे, जहां तक राज्यों में लोकायुक्त बनाने की बात है तो यह राज्यों का अधिकार है। यूपी में लोकायुक्त संस्था काफी प्रभावी है और उसकी सिफारिशों पर सरकार ने अमल भी किया है। लोकपाल बिल में सिटीजन चार्टर की बात कही गई है प्रदेश सरकार ने तो पहले से ही जनहित गारंटी अधिनियम के जरिए इसे लागू किया जा चुका है।

अन्ना के आंदोलन पर चिंता
मायावती ने कहा कि अन्ना के आंदोलन के दौरान रामलीला मैदान में कुछ असामाजिक तत्वों की उपस्थिति पाई गई है, गृह मंत्रालय उस पर सख्ती से निपटे। उत्तर प्रदेश में अन्ना समर्थक अभी तक शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे हैं पर उनको वह एडवांस में आगाह करती हैं। यदि उन्होंने कानून हाथ में लिया तो फिर उन सख्त क ार्रवाई की जाएगी।
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मायावती ने की अन्ना की तरफदारी

लखनऊ।
Story Update : Wednesday, August 17, 2011    4:49 PM
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने भ्रष्टाचार के खिलाफ समाजसेवी अन्ना हजारे के आन्दोलन को पूरा समर्थन देते हुए केन्द्र सरकार और सिविल सोसायटी को आम सहमति बनाने का सुझाव दिया है ताकि एक बेहतरीन कानून बनाया जा सके।

मायावती ने कहा कि वह खुद और बहुजन समाज पार्टी शुरू से ही भ्रष्टाचार और राजनीति में अपराधीकरण के खिलाफ रही है। उन्होंने कहा कि वह और उनकी पार्टी अन्ना के भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन का समर्थन करती है। केन्द्र सरकार की ओर से संसद में पेश लोकपाल विधेयक को लेकर उत्पन्न मतभेद को दूर करने के लिए दोनों पक्षों को मिलकर आपसी सहमति बनानी चाहिए ताकि एक बेहतरीन कानून बने और भ्रष्टाचार को रोका जा सके।

उन्होंने अन्ना की गिरफ्तारी की निंदा की और कहा कि उन्हें जिस तरह पुलिस ने गिरफ्तार किया वह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। बसपा सिर्फ अन्ना ही नहीं बल्कि उन सभी संगठनों का स्वागत करती है और अपना समर्थन देती है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। मायावती ने कहा कि बसपा ने भ्रष्टाचार के खिलाफ चलने वाले हर मुहिम का समर्थन किया है। पार्टी के प्रमुख नारों में यह शामिल रहा है।

उन्होंने कहा कि पार्टी शुरू से ही मुख्य रूप से भ्रष्टाचारमुक्त, अन्यायमुक्त और विकासयुक्त आधार पर काम कर रही है। उन्होंने कहा कि 2007 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का यह मुख्य नारा था। उनका कहना था कि उनकी सरकार भ्रष्टाचार के हमेशा खिलाफ रही है। भ्रष्टाचारियों से कभी कोई समझौता नहीं किया गया।

उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार और अपराधीकरण के मामले में पार्टी के सांसदों, मंत्रियों और विधायकों के खिलाफ भी कार्रवाई की गई है। मायावती ने कुछ महीने पहले अन्ना को सुझाव दिया था कि वह जनता के बीच जाएं और अपील करें कि लोकसभा के चुनाव में उनके जन लोकपाल विधेयक को समर्थन देने वाले प्रत्याशियों को जिताएं।
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अन्ना ने मायावती से मिलने का मांगा समय

लखनऊ।
Story Update : Saturday, July 02, 2011    12:29 PM
प्रख्यात समाजसेवी अन्ना हजारे ने जन लोकपाल विधेयक पर बातचीत के लिए उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से मिलने का समय मांगा है। मायावती से मिलकर अन्ना हजारे जन लोकपाल विधेयक पर आम सहमति बनाने के लिए बातचीत करना चाहते हैं। हालांकि मुख्यमंत्री ने उन्हें अभी मिलने का समय दिया है या नहीं इसकी जानकारी नहीं मिल सकी है।

बिल का मौजूदा स्वरूप में पारित होना मुश्किल
सूत्रों के मुताबिक हजारे ‌रविवार सुबह तक मायावती से मिलना चाहते हैं, क्योंकि इस मुद्दे पर 3 जुलाई को केंद्र सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलाई है। जन लोकपाल विधेयक पर मायावती अपना मत पहले ही स्पष्ट कर चुकी हैं। हाल ही में बसपा अध्यक्ष मायावती ने कहा था कि केंद्र की वर्तमान सरकार के कार्यकाल में हजारे के मन मुताबिक लोकपाल विधेयक पारित होना नामुमकिन है।

सांसदों को जितवाने का प्रयास करें
इसलिए हजारे के नेतृत्व वाली सिविल सोसायटी को इस मुद्दे को लेकर जनता के बीच जाना चाहिए। 2014 में प्रस्तावित लोकसभा चुनाव में ऐसे सांसदों को जितवाने का प्रयास करना चाहिए जो जन लोकपाल विधेयक के समर्थक हों और इसे संसद में पारित करवा सकें।

अन्य दलों के नेताओं से भी मिले
हजारे इस मसले पर भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी, बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार, राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव से मिल चुके हैं और आज उनका कार्यक्रम कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिलने का है।

बुधवार, 24 अगस्त 2011

भ्रष्टाचार के महानायक-अमर सिंह के ख़िलाफ़ चार्ज़शीट !

क्या सचमुच 'अमर सिंह' पर मुक़दमा चलेगा !
डॉ.लाल रत्नाकर 
(नीचे की बी बी सी की खबर से यही लगता है की)  



कभी समाजवादी पार्टी में रहे अमर सिंह ने अब अपनी नई पार्टी बनाई है.
संसद में रिश्वत लेकर वोट देने के मामले में राजनीतिज्ञ अमर सिंह के ख़िलाफ़ चार्जशीट दाखिल की गई है.
अमर सिंह पूर्व में समाजवादी पार्टी से जुड़े रहे हैं लेकिन अब उन्होंने अपनी अलग पार्टी बना ली है. उनके ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत आरोप तय किए गए हैं.
यह मामला 2008 का है जब बीजेपी के कुछ सांसद संसद में वोटिंग के दौरान सूटकेसों में पैसा भरकर ले गए थे और उन्होंने आरोप लगाया था कि उन्हें सरकार के हक में वोट देने के लिए पैसा दिया गया गया था.
इन सांसदों में से एक अशोक अर्गल के ख़िलाफ़ मामला चलेगा जबकि बाकी दोनों सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर भगोड़ा पर पहले ही घूस लेने का मामला चल रहा है.
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के तत्कालीन सलाहकार सुधींद्र कुलकर्णी पर भी आरोप है कि उन्होंने इस पूरे अभियान की योजना बनाई ताकि यूपीए सरकार की रिश्वत देने की मंशा का पर्दाफाश किया जा सके.
कुलकर्णी पर भी आपराधिक मामला चल सकता है जिसमें रिश्वत का प्रस्ताव देने का आरोप लगाया जा सकता है.
सन् 2008 में परमाणु सौदे के मुद्दे पर वोटिंग हुई थी. यूपीए सरकार को वोटिंग में बहुमत मिला लेकिन रिश्वत देकर वोट खरीदने का मामला बहुत विवादित रहा.
बीजेपी का कहना है कि यूपीए ने तीन भाजपा सांसदों अशोक अर्गल, फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर भगोड़ा को रिश्वत की पेशकश की गई थी और वो यही पैसा लेकर संसद में पहुंचे थे ताकि वो अपनी बात संसद के सामने रख सकें.
इस मामले में एक टीवी चैनल की निष्पक्षता भी संदेह के घेरे में आई थी जिसके साथ मिलकर रिश्वत के लेन देन की प्रक्रिया का एक स्टिंग आपरेशन भी किया गया था.
बाद में बीजेपी सांसद कुलस्ते और भगोड़ा पर रिश्वत लेने का आरोप लगाया गया और आरोपपत्र दायर किया गया जबकि पुलिस ने अर्गल के ख़िलाफ़ आरोपपत्र दायर करने के लिए लोकसभा स्पीकर से अनुमति मांगी है क्योंकि अर्गल अभी भी सांसद हैं.